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BSEB Class 11 Geography Geomorphic Processes Textbook Solutions PDF: Download Bihar Board STD 11th Geography Geomorphic Processes Book Answers

 BSEB Class 11 Geography Geomorphic Processes Textbook Solutions PDF: Download Bihar Board STD 11th Geography Geomorphic Processes Book Answers

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Bihar Board Class 11th Geography Geomorphic Processes Books Solutions

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Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Text Book Questions and Answers

(क) बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में से कौन सी एक अनुक्रमिक प्रक्रिया है?
(क) निक्षेपण
(ख) ज्वालामुखियता
(ग) पटल विरूपन
(घ) अपरदन
उत्तर:
(घ) अपरदन

प्रश्न 2.
जल योजना प्रक्रिया निम्नलिखित पदार्थों में से किसे प्रभावित करती है?
(क) ग्रेनाइट
(ख) क्वार्ट्ज
(ग) क्ले
(घ) लवण
उत्तर:
(घ) लवण

प्रश्न 3.
मलबा अवधाव की घाटी बनती है।
(क) भूस्खलन
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन
(ग) मंदी प्रवाही वृहत् संचलन
(घ) अवतलन/धसकन
उत्तर:
(ख) तीव्र प्रवाही वृहत् संचलन

प्रश्न 4.
भू-आकार की घाटी बनती है।
(क) बाढ़ क्षेत्र में
(ख) चूना क्षेत्र में
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में
(घ) हिमानी नदी क्षेत्र में
उत्तर:
(ग) प्रौढ़ नदी क्षेत्र में

(ख) निम्नलिखित प्रफ़्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अपक्षय पृथ्वी पर जैव विविधता के लिए उत्तरदायी है। कैसे?
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने एवं मुदा निर्माण कार्य में सहायक होती हैं बल्कि वे अपदन्न एवं वृहत संचलन के लिए भी उत्तरदायी हैं । जैव मात्रा एवं जैव विविधता प्रमुखतः वन (वनस्पति) की उपज हैं तथा वन अपक्षयी प्रावार की गहराई अर्थात् न केवल आवरण प्रस्तर एवं मिट्टी अपितु वृहत् संचलन पर निर्भर करता है।

यदि चट्टानों का अपक्षय न हो तो अपरदन का बोई महत्त्व नहीं होता। चट्टान का अपक्षय एवं निक्षेपण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान है। यह कुछ खनिजों जैसे लोहा, मैंगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा अयस्कों के समृद्धिकरण (enrichment) एवं संकेन्द्रण (concentration) में सहायक होता है।

प्रश्न 2.
वृहत् संचलन जो वारविक, तीव्र एवं गोचर/अवगम्य (Perceptible) हैं, वे क्या हैं? सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
वृहत् संचलन के अन्तर्गत वे सभी संचलन आते हैं, जिनमें चट्टानों के मलवा (debris) का गुरुत्वाकर्षण के सीधे प्रभाव के कारण ढाल के सहारे बना गतिज ऊर्जा या किसी भू-आकृतिक कारक की सहारप्ता के स्थानान्तरण निहित होता है। वृहत संचलन के लिए अपक्षय अनिवार्य नहीं है, यद्यपि वृहत् संचलन को बढ़ावा देता है।

असम्बद्ध कमजोर पदार्थ, छिछले संस्तर वाली चट्टानें, अंश, तीव्रता से झूके हुए संस्तर, खड़े भृगु या तीव्र ढाल, पर्याप्त वर्षा, मूसलाधार वर्षा तथा वनस्पति का अभाव, झीलों, नदियों जलाशयों से भरी मात्रा में जल निष्कासन, विस्फोट आदि वृहत् संचलन को अनुकूलित करते हैं।

प्रश्न 3.
विभिन्न गतिशिल एवं शक्तिशाली बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक क्या हैं तथा वे क्या प्रधान कार्य सम्पन करते हैं।
उत्तर:
बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपनी उर्जा से अन्तर्जनित शक्तियों से नियन्त्रित विवर्तनिक (tectonic) कारकों से उत्पन्न प्रवणता द्वारा निर्धारित वायुमण्डल से प्राप्त करते हैं। ढाल या प्रवणता बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारकों से नियन्त्रित विवर्तनिक कारकों द्वारा निर्मित होती हैं। बर्हिजनिक भू-आकृतिक कारक अपक्षय, वृहत क्षरण संचलन, अपरदन परिवहन आदि सभी प्रधान कार्य सम्पन्न करते हैं।

प्रश्न 4.
क्या मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है?
उत्तर:
हाँ, मृदा निर्माण में अपक्षय एक आवश्यक अनिवार्यता है क्योंकि अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों के समुच्चय पर निर्भर करता है। कालान्तर में ये समुदाय (combine) अपक्षयी प्रावार (Mantle) की मूल विशेषताओं को जन्म देते है और यह अपक्षयी प्रवार ही मृदा निर्माण का मल निवेश होता है।

(ग) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
“हमारी पृथ्वी भू-आकृतिक प्रक्रियाओं के दो विरोधात्मक (Opposing) वर्गों के खेल का मैदान है,” विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धरातल पृथ्वी मण्डल के अन्तर्गत उत्पन्न हुई बाह्य शक्तियों एवं पृथ्वी के अन्दर अद्भुत आन्तरिक शक्तियों से अनवरत प्रभावित होता है तथा यह सर्वदा परिवर्तनशील है। बाह्य शक्तियों को बहिर्जनिक (exogenic) तथा आन्तरिक शक्तियों को अन्तर्जनित (endogenic) शक्तियाँ कहते हैं।

बहिर्जनिक शक्तियों के क्रियाओं का परिणाम होता है उमड़ी हुई भू-आकृतियों का विघर्षण (wearing down) तथा बेसिन/निम्नक्षेत्रों/गों के भराव (अधिवृद्धि/तल्लोचन) धरातल पर अपरदन के माध्यम से उच्चावच के मध्य अन्तर के कम होने के तथ्य को कहते हैं, क्रमस्थापन radation) अन्तर्जनित शक्तियाँ निरन्तर धरातल के भागों के ऊपर उठाती हैं या उनका निर्माण करती है तथा इस प्रकार वे उच्चावच में मिलता को सम (बराबर) करने में असफल रहती है। अतएव भिन्नता तब तक बनी रहती है जब तक बर्हिजनिक एवं अन्तर्जनिक शक्तियों के विरोधात्मक प्रतिकूल कार्य चलते रहते हैं।

सामान्यतः अन्तर्जनित शक्तियाँ मूल रूप से आकति निर्मात्री शक्तियाँ हैं तथा बर्हिजनिक प्रक्रियायें मुख्य रूप से भूमि विघर्षण शक्तियाँ होती हैं। धरातल का निर्माण एवं विघटन क्रमशः अन्तर्जनित एवं बर्हिजनिक शक्तियों द्वारा भूपर्पटी के उद्भव एवं उसके वायुमण्डल द्वारा आवृत होने के समय से चला आ रहा है।

प्रश्न 2.
‘बहिर्जनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम ऊर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती हैं।’ व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
यह कहना बिल्कुल सत्य प्रतीत होता है कि बाहाजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य गर्मी से प्राप्त करती हैं। तापक्रम तथा वर्षा दो महत्त्वपूर्ण जलवायविक तत्व हैं जो विभिन्न प्रक्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं। सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं को एक सामान्य शब्दावली अनाच्छादन (denudation) के अन्तर्गत रखा जा सकता है। अपक्षय,

वहत क्षरण संचलन, अपरदन, परिवहन आदि इसमें सम्मिलित होते हैं। अनाच्छाद प्रक्रियाओं तथा उनसे सम्बन्धित परिचालक/प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि प्रत्येक प्रक्रिया एक विशिष्ट प्रेरक शक्ति को दर्शाता है। वनस्पति का घनत्व, प्रकार एवं वितरण, जो मुख्यतः उर्जा एवं तापमान पर निर्भर करते हैं, बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्राक्रियाओं पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। इन सभी बर्हिजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाओं की शक्ति का स्त्रोत ऊर्जा है। अत: हम कह सकते हैं कि बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियायें अपनी अन्तिम उर्जा सूर्य की गर्मी से प्राप्त करती है।

प्रश्न 3.
क्या भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं? यदि नहीं तो क्यों? सोदाहरण व्याख्या करें।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय – प्रक्रियाएँ कुछ अनुप्रयुक्त शक्तियों (forces) पर निर्भर करती हैं। ये अनुप्रयुक्त शक्तियाँ हो सकती हैं –
1. गुरुत्वाकर्षण शक्तियाँ, जैसे अधिक भार का दबाव, भार एवं अपरूपण प्रतिबल (sheadr stress)

2. तापक्रम में परिवर्तन क्रिस्टल वृद्धि पशुओं के कार्य के कारण उत्पन्न विस्तारण (expansion) शक्तियाँ, शुष्कण एवं आईन चक्रों से नियामित जल का दबाव। भौतिक अपक्षय प्रक्रियाओं में अधिकांश तापीय विस्तारण एवं दबाव के निर्मुक्त होने (release) के कारण होती है। ये प्राक्रियाएँ लघु एवं मन्द होती हैं।

लेकिन बार-बार संकुचन एवं विस्तारण के कारण चट्टान के सन्तति श्रांति (Fatigue) के फलस्वरूप ये चट्टानों को बड़ी हानि पहुंचा सकती हैं। रासायनिक अपक्षय प्रक्रियाओं का एक वर्ग, जैसे जलयोजन, ऑक्सीजन न्यूनीकरण, कार्बोनेटीकरण, विलयन, चट्टानों पर उन्हें अपघटित/वियोजित, घुलित या सूक्ष्म खण्डन अवस्था में रसायनिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ऑक्सीजन, सतही और मृदा जल एवं अन्य अम्ल द्वारा न्यूनीकरण के लिए कार्यरत रहता है।

इसमें ऊष्मा के साथ जल एवं वायु को विद्यमानता सभी रासयनिक प्रतिक्रियाओं को तीव्र गति देने के लिए आवश्यक है। अतः भौतिक एवं रसायनिक अपक्षय की ये प्रक्रियाएँ अतसम्बन्धित हैं। ये साथ-साथ चलती रहती हैं तथा अपक्षय प्रक्रिया को त्वरित बना देती हैं।

प्रश्न 4.
आप किस प्रकार मृदा निर्माण प्रक्रियाओं तथा मृदा निर्माण कारकों के बीच अन्तर ज्ञात करते हैं? जलवायु एवं जैविक क्रियाओं की मृदा निर्माण में दो महत्त्वपूर्ण कारकों के रूप में क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाएं सर्वधम अपक्षय पर निर्भर करती हैं तथा अपक्षय जलवायु, चट्टान निर्माणकारी पदार्थों की विशेषताओं एवं जीवों सहित कई कारकों समुच्चय पर निर्भर करता है। मृदा निर्माण पाँच मूल कारकों के द्वारा नियन्त्रित होता है। ये कारक हैं –

• जलवायु
• स्थलाकृति
• उच्चावच मूल पदार्थ
• चट्टान जैविक प्रक्रियाएँ
• कालावधि वस्तुतः मृदा निर्माण कारक संयुक्त रूप से कार्यरत रहते हैं एवं एक-दूसरे के कार्य को प्रभावित करते हैं।

जलवायु (Climate) – जलवायु मृदा निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण सक्रिय कारक है। मृदा के विकास में संलग्न जलवायविक तत्त्वों में प्रमुख हैं –

प्रवणता, बारम्बारता एवं वर्षा-वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता के सन्दर्भ में नमी।
तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

• वर्षा से मृदा को जल मिलता है। रासायनिक एवं जैविक क्रियाएँ इसके बिना सम्भव नहीं होती । कुछ रसायन पानी में घुल जाती हैं एवं
• सकारात्मक तथा नकारात्मक रूप से आवेशित घटकों में अपने को अलग कर लेती हैं।
• ये तत्त्वों के जटिल रासायनिक अन्तः परिवर्तन/विनिमय में सहायक होते हैं जो मिट्टी के विकास एवं पौधे की वृद्धि के लिए आवश्यक हैं।

जैविक क्रियायें (Biological Activities) – वनस्पति आवरण एवं जीव जो मूल पदार्थों पर प्रारम्भ तथा बाद में विद्यमान रहते हैं मृदा में जैव पदार्थ, नमीधारण की क्षमता तथा नाइट्रोजन इत्यादि जोड़ने में सहायक होते हैं। मृत पौधे मृदा को सूक्ष्मता विभाजित जैव पदार्थ ह्यूमस प्रदान करते हैं। कुछ जैविक अम्ल जो ह्यूमस बनने की अवधि में निर्मित होते हैं मृदा के मूल पदार्थों के खनिजों के विनियोजन में सहायता करते हैं। बैक्टेरियल कार्य की प्रवणता ठण्डी एवं गर्म जलवायु की मिट्टियों/मृदाओं में अन्तर को दर्शाती हैं।

राइजोबियम (Rhizobium) एक प्रकार के बैक्टेरिया, जंतुवाले पौधे की जड़ ग्राथिका में रहता है तथा मेजबान पौधों के लिए लाभकारी नाइट्रोजन निर्धारित करता है। चींटी, दीमक, केचुए, कृतक (roderts) इत्यादि जानवरों का महत्त्व अभियान्त्रिकी (mechanical) सा होता है, लेकिन मृदा निर्माण में यह महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वे मृदा को बार-बार ऊपर नीचे करते रहते हैं।

(घ) परियोजना कार्य (Project Work)

प्रश्न 1.
अपने चतुर्दिक विद्यमान भू-आकृतिक/उच्चावच एवं पदार्थों के आधार पर जलवायु, सम्भव अपक्षय प्रक्रियाओं एवं मृदा के तत्त्वों और विशेषताओं को परखिए एवं अंकित कीजिए।
उत्तर:
इस अध्याय को ध्यानपूर्वक पढ़िए तथा पूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित जानकारियों एवं विशेषताओं को सूचीबद्ध करें परियोजना को स्वयं करें। इस अध्याय में जूछे गए प्रश्नों से सम्बन्धित सभी जानकारियाँ दी गई हैं।

Bihar Board Class 11 Geography भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ Additional Important Questions and Answers

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
अवसर्पण तथा शैल पतन किसे कहते हैं?
उत्तर:
दाल जिस पर संचलन होता है, के संदर्भ में पश्च-आवर्तन (Rotation) के साथ शैल-मलबा की एक या कई इकाइयों के फिसलन (slipping) को अवसर्पण कहते हैं। किसी तीव्र ढाल के सहारे शैल खण्डों का ढाल से दूरी रखते हुए स्वतन्त्र रूप से गिरना शैल पतन (Fall) कहलाता है।

प्रश्न 2.
अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, अनिवार्य नहीं। इस पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपरदन द्वारा उच्चावचन का निम्नीकरण होता है। अर्थात् भू-दृश्य विधर्षित होते जाते हैं। इसका तात्पर्य ये है कि अपक्षय अपरदन में सहायक होता है, लेकिन अपक्षय अपरदन के लिए अनिवार्य दशा नहीं है। अपक्षय, वृहत् क्षरण एवं अपरदन निम्नीकरण की प्रक्रियाएँ हैं।

प्रश्न 3.
वृहत् संचलन और अपरदन में अन्तर बतायें।
उत्तर:
वृहत् संचलन में शैल मलबा चाहे वह शुष्क हो अथवा नम, गुरुत्वाकर्षण के कारण स्वयं आधार तल पर जाते हैं। लेकिन प्रवाहशील जल, हिमानी लहरें एवं धाराएँ तथा वायु निलाम्बित मलबे को नहीं ढोते हैं। वस्तुत: यह अपरदन ही है जो धरातल में होने वाले अनवरत परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है। अपरदन एवं परिवहन गतिज ऊर्जा द्वारा नियन्त्रित होता है। धरातल के पदार्थों का अपरदन एवं परिवहन वायु, प्रवाहशील जल, हिमानी लहरों एवं धाराओं तथा भूमिगत जल द्वारा होता है।

प्रश्न 4.
मृदा निर्माण में समय (कालवधि-time) की क्या भूमिका है?
उत्तर:
मृदा निर्माण प्रक्रियाओं के प्रचलन में लगने वाले काल (समय) की अवधि मृदा की · परिपक्वता एवं उसके पार्थिवका (profile) का विकास निर्धारण करती है। एक मृदा तभी परिपक्व होती है जब मृदा निर्माण की सभी प्रक्रियाएँ लम्बे काल तक पार्थिवका विकास करते हुए कार्यरत रहती है। कुछ समय पहले निक्षेपित जलोढ़ मिट्टी या हिमानी टिले से विकसित मृदायें तरुण या युवा (Young) मानी जाती हैं तथा उनमें संस्तर (Horizon) का अभाव होता है अथवा कम विकसित संस्तर मिलता है।

प्रश्न 5.
मृदा निर्माण में जलवायु किस प्रकार सहायक है?
उत्तर:
मृदा के विकास में संलग्न जलवायवी तत्त्वों में प्रमख हैं –

1. प्रवणता वर्षा एवं बारम्बारता वाष्पीकरण की अवधि तथा आर्द्रता बारम्बारता
2. तापक्रम में मौसमी एवं दैनिक भिन्नता।

प्रश्न 6.
ऑक्सीकरण एवं न्यूनीकरण में अन्तर बताइए।
उत्तर:
खनिज एवं ऑक्सीजन का संयोग, ऑक्सीकरण कहलाता है। जहाँ वायुमण्डल एवं ऑक्सीजन युक्त जल मिलते हैं। इस प्रक्रिया में लौह, मैंगनीज, गंधक (Suphur) इत्यादि सर्वाधिक शामिल होते हैं। ऑक्सीकरण एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है जो लौह धारक बायोटाइट, ओलीवाइन एवं पाइरोक्सीन जैसे खनिजों को प्रभावित करती है। ऑक्सीकरण होने पर लौह का लाल रंग भूरे या पीले रंग में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 7.
अपक्षय के महत्त्व पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अपक्षय प्रक्रियाएँ शैलों को छोटे-छोटे टुकड़ो में तोड़ने के लिए तथा न केवल आवरण प्रस्तर एवं मृदा निर्माण के लिए मार्ग प्रशस्त करती है अपितु अपरदन एवं वृहत् संचालन के लिए भी उत्तरदायी होती है। यदि शैलों का अपक्षय न हो तो अपरदन का कोई महत्त्व नहीं होता । शैलों का अपक्षय राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मूल्यवान कुछ खनिजों जैसे-लोहा, मैगनीज, एल्यूमिनियम, ताँबा के अयस्कों के समृद्धिकरण एवं संकेन्द्रण में सहायक होता है। अपक्षय मृदा निर्माण की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है।

प्रश्न 8.
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर स्पष्ट करें।
उत्तर:
अपरदन तथा अपक्षय में अन्तर –

प्रश्न 9.
अन्तर्जात बल तथा बर्हिजात बल किसे कहते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के आन्तरिक भाग से उत्पन्न होने वाले बल अन्तर्जात बल कहे जाते हैं। इन बलों द्वारा भूतल पर असमानताओं का सूत्रपात होता है। पृथ्वी की सतह पर उत्पन्न होने वाले बल बर्हिजात बल कहे जाते हैं। इन्हें समतल स्थापक बल भी कहते हैं। ये बल पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा भूतल पर उत्पन्न विषमताओं को दूर करने में हमेशा प्रयत्नशील रहते हैं।

प्रश्न 10.
संचलन के कौन-से तीन रूप होते हैं?
उत्तर:
संचलन के निम्न तीन रूप होते हैं –

1. अनुप्रस्थ विस्थापन (तुषार वृद्धि या अन्य कारणों से मृदा का अनुप्रस्थ विस्थापन)
2. प्रवाह एवं
3. स्खलन

प्रश्न 11.
वृहत् संचलन की संक्रियता के लिए जिम्मेवार किन्हीं तीन कारकों के बारे में बताइए।
उत्तर:

1. प्राकृतिक एवं कृत्रिम साधनों के माध्यम से टिकने के आधार का हटना
2. ढालों की प्रवणता एवं ऊँचाई में वृद्धि
3. पदार्थों के प्राकृतिक अथवा कृत्रिम भराव के कारण उत्पन्न अतिभार।

प्रश्न 12.
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर बताएँ।
उत्तर:
भौतिक अपक्षय तथा रासायनिक अपक्षय में अन्तर –

प्रश्न 13.
मिट्टी और शैल में क्या अन्तर होता है?
उत्तर:
मिट्टी और शैल में अन्तर –

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न एवं उनके उत्तर

प्रश्न 1.
भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ किसे कहते हैं? क्या भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं या दोनों एक ही हैं?
उत्तर:
धरातल के पदार्थों पर अन्तर्जनित एवं बर्हिजनित बलों द्वारा भौतिक दबाव तथा रासायनिक क्रियाओं के कारण भूतल के विन्यास को भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ कहते हैं। पटल विरूपण (Diastrophism) एवं ज्वालामुखीयता (Volcanism) अन्तर्जनित भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय, वृहत् क्षरण (Mass wasting), अपरदन एवं निक्षेपण (Deposition) बाह्यजनिक भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। प्रकृति के किसी भी बाह्यजनिक तत्त्व (जैसे जल, हिम, वायु इत्यादि) जो धरातल के पदार्थों का अधिग्रहण (Acquire) तथा परिवहन करने में सक्षम हैं, को भू-आकृतिक कारक कहा जा सकता है।

जब प्रकृति के तत्त्व ढाल प्रवणता के कारण गतिशील हो जाते है तो पदार्थों को हटाकर ढाल के सहारे ले जाते हैं और निचले भागों में निक्षेपित कर देते हैं। भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ तथा भू-आकृतिक कारक, विशेषकर बर्हिजनिक, को यदि स्पष्ट रूप से अलग-अलग न कहा जाए तो इन्हें एक ही समझना होगा क्योंकि ये दोनों एक ही होते है।

एक प्रक्रिया एक बल होता है जो धरातल के पदार्थों के साथ अनूप्रयूक्त होने पर प्रभावी हो जाता है। एक कारक (Agent) एक गतिशील माध्यम (जैसे प्रवाहित जल, हिमानी हवा लहरें एवं धाराएँ इत्यादि) हैं जो धरातल के पदार्थों को हटाता, ले जाता है तथा निक्षेपित करता है। इस प्रकार प्रवाहयुक्त जल, भूमिगत जल, हिमानी, हवा, लहरों, धाराओं इत्यादि को भू-आकृतिक कारक कहा जाता है।

प्रश्न 2.
गुरुत्वकर्षण बल और पटल विरूपण (Diastrophism) के विषय में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुरुत्वाकर्षण हाल के सहारे सभी गतिशील पदार्थों को सक्रिय बनाने वाला दिशात्मक (Directional) बल होने के साथ-साथ धरातल के पदार्थों पर दबाव (stress) डालता है। अप्रत्यक्ष गुरुत्वाकर्षण प्रतिबल (stress) लहरों एवं ज्वार भाटा जनित धाराओं को क्रियाशील बनाता है। निःसन्देह गुरुत्वाकर्षण एवं ढाल प्रवणता के अभाव में गतिशीलता सम्भव नहीं है। अतः अपरदन, परिवहन एवं निक्षेपण भी नहीं होगा। गुरुत्वाकर्षण एक ऐसा बल है जो भूतल के सभी पदार्थों के संचलन को प्रारम्भ करते हैं। सभी संचलन, चाहे वे पृथ्वी के अन्दर हो या सतह पर, प्रवणता के कारण ही घटित होते हैं, जैसे ऊँचे स्तर से नीचे स्तर की ओर, तथा उच्च वायु दाब क्षेत्र से निम्न वायु दाब क्षेत्र की ओर ।

पटल विरुपण (Diastrophism) – सभी प्रक्रियाएँ जो भू-पर्पटी को संचालित, उत्थापित तथा निर्मित करती हैं, पटल विरूपण के अन्तर्गत आती हैं। इनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं –

• तीक्ष्ण वलयन के माध्यम से पर्वत निर्माण तथा भू-पर्पटी की लम्बी एवं संकीर्ण पट्टियों को प्रभावित करने वाली पर्वतनी प्रक्रियाएँ
• धरातल के बड़े भाग के उतापन या विकृति में संलग्न महाद्वीप रकम सम्बन्धी प्रक्रियाएँ
• अपेक्षाकृत छोटे स्थानीय संचलन के कारण उत्पन्न भूकम्प
• पपटी प्लेट के क्षैतिज संचलन करने में प्लेट विवर्तनिकी की भूमिका।

प्लेट विवर्तनिक/प्रवर्तनी की प्रक्रिया में भू-पर्पटी वलयन के रूप में तीक्ष्णता से विकृत हो जाती है। महाद्वीप रचना के कारण साधारण विकृति हो सकती है। प्रवर्तनी पर्वत निर्माण प्रक्रिया है, जबकि महाद्वीप रचना महाद्वीप निर्माण प्रक्रिया है। प्रवर्तनी, महाद्वीप रचना (Empeirogeny) भूकम्प एवं प्लेट विवर्तनिक की प्रक्रियाओं से भू-पर्पटी में घंश तथा विभंग हो सकता है। इन सभी प्रक्रियाओं के कारण दबाव, आयतन तथा तापक्रम में परिवर्तन होता है, जिसके फलस्वरूप शैलों का कायान्तरण प्रेरित होता है।

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